भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा भौगोलिक संदर्भ में
शिवलाल धाकड
पूर्व सहायक आचार्य, शहीद रूपाजी कृपा जी राजकीय महाविद्यालय, बेंगू, चित्तौड़गढ़, राजस्थान
*Corresponding Author E-mail: sandhyasahuwe@gmail.com
ABSTRACT:
कर्म-सिद्धान्त, जहाँ तक वर्तमान जीवन का सम्बन्ध है, भाग्यवाद को प्रश्रय देता है, क्योंकि वर्तमान जीवन अतीत जीवन के कर्मों का फल है। परन्तु जहाँ तक भविष्य जीवन का सम्बन्ध है यह मनुष्य को वर्तमान शुभ कर्मों के आधार पर भविष्य जीवन का निर्माण करने का अधिकार प्रदान करता है। इस प्रकार कर्म-सिद्धान्त भाग्यवाद का खंडन करता है।
KEYWORDS: कर्म, फल, अनिवार्य, संबंध।
INTRODUCTION:
भारतीय दर्शन में तीन प्रकार के होते हैं:- १. संचित कर्म २. प्रारव्ध कर्म और ३. क्रियमाण कर्म।
संचित कर्म:- धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं। सनातन धर्म भाग्यवादियों का धर्म नहीं है। वेद, उपनिषद और गीता- तीनों ही कर्म को कर्तव्य मानते हुए इसके महत्व को बताते हैं। यही पुरुषार्थ है।श्रेष्ठ और निरंतर कर्म किए जाने या सही दिशा में सक्रिय बने रहने से ही पुरुषार्थ फलित होता है। इसीलिए कहते हैं कि काल करे सो आज कर। वेदों में कहा गया है कि समय तुमको बदले इससे पूर्व तुम ही स्वयं को बदल लो- यही कर्म का मूल सिद्धांत है। अन्यथा फिर तुम्हें प्रकृति या दूसरों के अनुसार ही जीवन जीना होगा। ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है।
बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म ’संस्कार ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे ’संचित कर्म’कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। दरअसल, इन संचित कर्मों में से एक छोटा हिस्सा हमें नए जन्म में भोगने के लिए मिल जाता है। इसे प्रारब्ध कहते हैं। ये प्रारब्ध कर्म ही नए होने वाले जन्म की योनि व उसमें मिलने वाले भोग को निर्धारित करते हैं। फिर इस जन्म में किए गए कर्म, जिनको क्रियमाण कहा जाता है, वह भी संचित संस्कारों में जाकर जमा होते रहते हैं।
हम जो भी कर रहे हैं जैसे सोचना, देखना, सुनना, समझना और अन्य कर्म करना। उनमें से कुछ हमारी आदतें बन कर संचित होने लगते हैं। संचित अर्थात संग्रहित, संग्रहित अर्थात स्टोर। वह कर्म जो स्टोर हो रहे हैं वह संचित कर्म कहे जाते हैं। बार बार एक ही कर्म या कार्य करने से वह कर्म या कार्य स्टोर हो जाता है। मरने के समय इस स्टोर कर्म का कुछ भाग हमारे साथ अगले जन्म में भी चला जाता है। वही भाग प्रारब्ध कहलाता है।
जिस तरह से चोर को मदद करने के जुर्म में साथी को भी सजा होती है ठीक उसी तरह काम्य कर्म और संचित कर्म में हमें अपनों के किए हुए कार्य का भी फल भोगना पड़ता है और इसीलिए कहा जाता है कि अच्छे लोगों का साथ करो ताकि कर्म की किताब साफ रहे। जिस बालक को बचपन से ही अच्छे संस्कार मिले हैं उसका कर्म भी अच्छा ही होगा और फिर उसके संचित कर्म भी अच्छे ही होंगे। अगले जन्म में उसे अच्छा प्रारब्ध ही मिलेगा।
प्रारब्ध कर्म:- वह कर्म है जिसका फल मिलना अभी शुरू हो गया है। इसका सम्बन्ध अतीत जईवन से है। वर्तमान जीवन के कर्मों को, जिनका फल भविष्य में मिलेगा, संचीयमान कर्म कहा जाता है। प्रारब्ध कर्म, जिसे “भोग्य कर्म“ भी कहा जाता है, वे कर्म हैं जो पहले ही शुरू हो चुके हैं और जिनके फल अवश्य ही भोगने होंगे। ये कर्म हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का एक छोटा सा हिस्सा होते हैं जो इस जन्म में फल देने के लिए चुने गए हैं। प्रारब्ध कर्म भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रारब्ध कर्म कैसे कार्य करते हैं और हम उनके प्रभावों को कैसे कम कर सकते हैं।
उदाहरण:- यदि किसी व्यक्ति को इस जन्म में गरीबी का सामना करना पड़ रहा है, तो यह उनके पिछले जन्मों में किए गए कर्मों का परिणाम हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति को अच्छी शिक्षा और नौकरी मिलती है, तो यह उनके पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कर्मों का परिणाम हो सकता है।
प्रारब्ध कर्म और अन्य कर्मों के बीच अंतर:- प्रारब्ध कर्मः वे कर्म हैं जो पहले ही शुरू हो चुके हैं और जिनके फल अवश्य ही भोगने होंगे। संचित कर्मः वे कर्म हैं जो अभी तक शुरू नहीं हुए हैं, लेकिन भविष्य में फल देंगे।
अंहंउप कर्म:- वे कर्म हैं जो हम इस जन्म में कर रहे हैं।
प्रारब्ध कर्म कैसे कार्य करते हैं:-
ऽ प्रारब्ध कर्म हमारे जन्म के समय तय होते हैं।
ऽ हम अपने प्रारब्ध कर्मों को बदल नहीं सकते हैं, लेकिन हम उनके प्रभावों को कम करने के लिए प्रयास कर सकते हैं।
ऽ हम अच्छे कर्म करके और सकारात्मक सोच रखकर अपने प्रारब्ध कर्मों के नकारात्मक प्रभावों को कम कर सकते हैं।
प्रारब्ध कर्म और मुक्ति:-
ऽ मुक्ति का अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति।
ऽ प्रारब्ध कर्मों को समाप्त किए बिना मुक्ति प्राप्त करना संभव नहीं है।
ऽ हम कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग के माध्यम से अपने प्रारब्ध कर्मों को समाप्त कर सकते हैं।
ऐसा अक्सर कहा जाता है कि आज हम जो भी फल भोग रहे हैं वह हमारे पूर्वजन्म के कर्म के कारण है लेकिन यह बात पूर्णतः सत्य नहीं है। इसका मतलब यह कि इसमें कुछ तो सच है। अक्सर समाज में ऐसी धारणाएं प्रचलित हो जाती है और इस धारणा के चलते हिन्दू धर्म को भाग्यवादियों का धर्म मान लिया जाता है। इस धारणा के चलते यह भी मान लिया जाता है कि फिर तो हमें कोई कर्म करना ही नहीं चाहिए जब सबकुछ पूर्वजन्म से ही तय और निश्चित है तो।... लेकिन ऐसी धारणा का प्रचलन समाज में इसलिए होता है क्योंकि अधिकांश लोग कर्म के सिद्धांत को पूर्णतः समझते नहीं है।
धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं। सनातन धर्म भाग्यवादियों का धर्म नहीं है। कर्म से ही भाग्य का जन्म होता है। वेद, उपनिषद और गीता- तीनों ही कर्म को कर्तव्य मानते हुए इसके महत्व को बताते हैं । यही पुरुषार्थ है। श्रेष्ठ और निरंतर कर्म किए जाने या सही दिशा में सक्रिय बने रहने से ही पुरुषार्थ फलित होता है। वेदों में कहा गया है कि समय तुमको बदले इससे पूर्व तुम ही स्वयं या समय को बदल लो- यही कर्म का मूल सिद्धांत है। अन्यथा फिर तुम्हें प्रकृति या दूसरों के अनुसार ही जीवन जीना होगा। व्यक्ति निरंतर कर्म करता रहता है।
सोया हुआ व्यक्ति भी कर्म कर रहा है। कर्म का संबंध हमारे शरीर, मन, मस्तिष्क और चित्त की है। गति कभी भी रुकती नहीं है। रुकने में भी एक गति है। इस कर्म गति से ही अगले कर्म की गति निर्मित होती है। कुछ ऐसा कर्म जिनका फल चमत्कार की तरह प्रस्तुत होता है। धर्म शास्त्रों में मुख्यतः छह तरह के कर्म का उल्लेख मिलता है- 1. नित्य कर्म (दैनिक कार्य), 2. नैमित्य कर्म (नियमशील कार्य), 3. काम्य कर्म (किसी मकसद से किया हुआ कार्य), 4. निश्काम्य कर्म (बिना किसी स्वार्थ के किया हुआ कार्य), 5. संचित कर्म (प्रारब्ध से सहेजे हुए कर्म) और 6. निषिद्ध कर्म (नहीं करने योग्य कर्म)।
वर्तमान में जो कर्म किया जाता है वही क्रियामाण कर्म कहा जाता है। अक्सर लोग प्रारब्ध कर्म की बुराई करते हुए कहते हैं कि यह तो हिन्दू धर्म की भाग्यवादी और अकर्मण्यता की विचारधारा से उपजा विचार है। यह लोगों को निकम्मा बनाता है। इसके जवाब में पहले यह जान लेते हैं कि प्रारब्ध कर्म क्या है। हम जोभी कर रहे हैं जैसे सोचना, देखना, सुनना, समझना, रोना, हंसना और अन्य कर्म करना । उनमें से कुछ हमारी आदतें बनकर संचित होने लगते हैं। संचित अर्थात संग्रहित, संग्रहित अर्थात स्टोर। वह कर्म जो स्टोर हो रहे हैं वह संचित कर्म कहे जाते हैं। बार-बार एक कर्म या कार्य करने से वह कर्म या कार्य स्टोर हो जाता है। मरने के समय इस स्टोर कर्म का कुछ भाग हमारे साथ अगले जन्म में भी चला जाता है। वही भाग प्रारब्ध कहलाता है। किसी व्यक्ति की पिछले जन्म में एक टांग टूटी थी। और उसने यदि अपने पिछले जीवन का लगभग 10 साल एक टांग पर ही गुजारा है तो वह इस जीवन में अपनी एक टांग को लेकर अजीब ही स्थिति में रहेगा। उसके अवचेतन मन में यह बात है कि मेरी एक टांग ही है।
हालांकि उसका चेतन मन यह नहीं जानता। लेकिन आदत वष उसकी एक टांग ज्यादा सक्रिय रहती है जबकि दूसरी टांग नहीं। यह अहसास अजीब होता है। दूसरा उदाहरण यह कि यदि किसी व्यक्ति की पिछले जन्म में उसकी किसी घटना, दुर्घटना आदि में समय पूर्व मौत हो गई है तो निश्चित ही वह वैसी परिस्थिति से अक्सर डरा हुआ रहेगा जिस परिस्थिति में उसकी मौत हुई थी। तीसरा उदाहरण यदि किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का रोग हुआ है तो वह उसके द्वारा किए गए पूर्व कर्म का ही परिणाम है। उसने निश्चित ही अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा, अनावश्यक खाद्य पदार्थों का सेवन किया होगा या कोई संक्रमित भोजन व पानी को ग्रहण किया होगा।
हालांकि आप पूछ सकते हैं कि किसी व्यक्ति के सिर पर अचानक कहीं से पत्थर आकर लगे तो यह उसने कौन-सा कर्म किया होगा जो पत्थर लगा? पहली बात तो यह कि उसका वहां खड़ा होना ही उसका प्रथम कर्म है। बाकी इसे समझने के लिए कर्म सिद्धांत के विस्तार में जाना होगा। हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक या संग्राहक होता है।
पुनर्जन्म और कर्मों का सिद्धांत:-
यहूदी और उनसे निकले धर्म पुनर्जन्म की धारणा को नहीं मानते। मरने के बाद सभी कयामत के जगाए जाएंगे अर्थात तब उनके अच्छे और बुरे कर्मों पर न्याय होगा । हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। इसका अर्थ है कि आत्मा जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की शिक्षात्मक प्रक्रिया से गुजरती हुई अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। जन्म और मत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि आत्मा मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेती।
मोक्ष प्राप्ति का रास्ता कठिन है। वेद और उपनिषद कहते हैं कि शरीर छोड़ने के बाद भी तुम्हारे वे सारे कर्मों के क्रम जारी रहेंगे, जो तुम यहां रहते हुए करते रहे हों और जब अगला शरीर मिलेगा तो यदि तुमने दुःख, चिंता, क्रोध और उत्तेजना को संचित किया है तो अगले जन्म में भी तुम्हें वही मिलेगा, क्योंकि यह आदत तुम्हारा स्वभाव बन गई है।
जन्म चक्र:- पुराणों के अनुसार व्यक्ति की आत्मा प्रारंभ में अधोगति होकर पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, पशु-पक्षी योनियों में विचरण कर ऊपर उठती जाती है और अंत में वह मनुष्य वर्ग में प्रवेश करती है। मनुष्य अपने प्रयासों से देव या दैत्य वर्ग में स्थान प्राप्त कर सकता है। वहां से पतन होने के बाद वह फिर से मनुष्य वर्ग में गिर जाता है। यह क्रम चलता रहता है। यही कारण है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार जीवन मिलता है और वह अपने कर्मों का फल भोगता रहता है। यही कर्मफल का सिद्धांत है।
’प्रारब्ध’ का अर्थ ही है कि पूर्व जन्म अथवा पूर्वकाल में किए हुए अच्छे और बुरे कर्म जिसका वर्तमान में फल भोगा जा रहा हो। विशेषतया इसके 2 मुख्य भेद हैं कि संचित प्रारब्ध, जो पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप होता है और क्रियमान प्रारब्ध, जो इस जन्म में किए हुए कर्मों के फलस्वरूप होता है। इसके अलावा अनिच्छा प्रारब्ध, परेच्छा प्रारब्ध और स्वेच्छा प्रारब्ध 3 गौण भेद भी हैं। प्रारब्ध कर्मों के परिणाम को ही कुछ लोग भाग्य और किस्मत का नाम दे देते हैं। पूर्व जन्म और कर्मों के सिद्धांत को समझना जरूरी है। संस्कार अर्थात हमने जो भी अच्छे और बुरे कर्म किए हैं वे सभी और हमारी आदतें।
क्रियमाण कर्म:-
हिंदू धर्म में , वह कर्म है जो मनुष्य वर्तमान में बना रहा है, जिसका फल भविष्य में अनुभव किया जाएगा। दिन-ब-दिन उत्पन्न होने वाले ये कार्य या तो प्रारब्ध कर्म में शामिल हो सकते हैं और इसी जीवन में अनुभव किए जा सकते हैं या संचित कर्म में शामिल हो सकते हैं और भविष्य के जन्मों में अनुभव किए जा सकते हैं। क्रियमाण कर्म ही एकमात्र ऐसा कर्म है जिस पर मनुष्य का नियंत्रण होता है। क्रियमाण कर्म भारतीय दर्शन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह हमें सिखाता है कि हमारे पास अपने जीवन को नियंत्रित करने और वांछित परिणाम प्राप्त करने की शक्ति है।
क्रियमाण कर्म की विशेषताएं:-
ऽ क्रियमाण कर्म नए कर्मों को जन्म देते हैं।
ऽ ये कर्म परिवर्तनशील होते हैं, अर्थात इनके फल को बदला जा सकता है।
ऽ इन कर्मों का प्रभाव तुरंत या निकट भविष्य में अनुभव किया जाता है।
ऽ क्रियमाण कर्म स्वतंत्र इच्छा से किए जाते हैं।
क्रियमाण कर्म का महत्व:-
ऽ क्रियमाण कर्म हमें अपने जीवन को आकार देने की शक्ति देते हैं।
ऽ हम इन कर्मों के माध्यम से अच्छे या बुरे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
ऽ क्रियमाण कर्म हमें आत्म-सुधार और आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाते हैं।
उदाहरण:-
ऽ यदि हम किसी की मदद करते हैं, तो यह एक क्रियमाण कर्म है जिसके फलस्वरूप हमें खुशी और संतुष्टि मिलेगी।
ऽ यदि हम किसी को नुकसान पहुंचाते हैं, तो यह एक क्रियमाण कर्म है जिसके फलस्वरूप हमें दुख और पछतावा होगा।
End Notes:
कर्म भारतीय दर्शन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो कार्य-कारण के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि हमारे कर्म, चाहे वे विचार हों, शब्द हों या कार्य हों, उनके परिणाम होते हैं। ये परिणाम हमारे वर्तमान और भविष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। कर्म हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन के लिए जिम्मेदार हैं। कर्म हमें अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने में मदद करता है। कर्म हमें आत्म-सुधार के लिए प्रेरित करता है। यह हमें नैतिक जीवन जीने और मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।
CONCLUSION:
फल में आसक्ति होने पर अभीष्ट फल की प्राप्ति होने पर प्रसन्नता होती है। जबकि सफलता मिलने पर हदय उत्पन्न होता है। ऐसी बुद्धि लौकिक विषयों में और विभिन्न रागद्रेष आदि द्रनद्ठों में स्थित रहती है, न कि आत्मा में। सफलता और असफलता अथवा सिद्धि और असिद्धि के विषय में होने वाले प्रसन्नता और दुख का त्याग करने से समता प्राप्त होती है। समता से बुद्धि अपने कर्तव्यपथ पर दुढ़ रहती है कर्मफल में आसक्ति नहीं होती है, और बुद्धि आत्मा में स्थित होती है। समबुद्धि प्राप्त करने के लिए साधक को भगवान का सहारा लेना चाहिए। उसे अपने भीतर यह भावना दृढ़ करनी चाहिए कि जब वह अपने कर्तव्य कर्म का ठीक-ठीक पालन करेगा या उसने कर दिया है तो उसका उचित फल उसे ठीक समय पर अवश्य मिलेगा। उसे अपने निजी आवश्यकताओं की पूर्ति और रक्षा की चिंता आहंकारिक रूप से स्वयं न करते हुए (निर्योग-क्षेम) उनका भार भगवान पर ही छोड़ना चाहिए।’भगवान स्वयं कहते हैं जो मनुष्य अन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं उनके योगक्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।’अखिल विश्व का पालन करने वाला भगवान कभी भी अपने- भक्तों की उपेक्षा नहीं कर सकता। अतः साधक को कर्म का कया फल मिले, और किस समय मिले इसका भार भगवान पर छोड़ देना चाहिए। फल मिलने में कभी कभी विलम्ब भी हो सकता है, और यह भी संभव है कि फल साधक की आशा से भिन्न या विपरीत हो परन्तु ऐसा होने का कारण अन्याय नहीं है, अपितु भगवान की ऐसी व्यवस्था है कि जिसमें अनेक बार तात्कालिक सुख और सिद्धि की अपेक्षा कष्ट और असिद्धि के द्वारा अधिक उत्कृष्ट सुख और सिद्धि प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के कामना, भोग और द्रन्दमय जीवन से आध्यात्म जीवन में उन्नति का मार्ग अनेक प्रकार के कष्टों और विपत्तियों से भरा हुआ है। ये कष्ट अनेक वार भगवान की ओर से ही साधना या तप के रूप में साधक के लिए नियुक्त किये जाते हैं जिनका दिव्य रहस्य उसे आगे चलने पर ज्ञात होता है।’
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1- भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा, लेखक-सत्यप्रकाश सिंह, मनीश प्रकाशन वाराणसी, हिन्दी तथा संस्कृत, 2012
2- उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय पेज 15 भारतीय दर्शन ड।ैस्.503ण्
3- अमर कोष
4- अर्ली बुद्धिज्म एण्ड भगवद्गीता - डॉ. के. एन. उपाध्याय
5- अशवक्र
6- एन आइडियलिस्टिक व्यू आफ, लाइफ - डॉ. राधाकृष्णन्
7- भारतीय दर्शन प्रथम खण्ड - डॉ. राधाकृष्णन्
8- भारतीय दर्शन - डॉ. नन्द किशोर देवराज
9- भारतीय दर्शन की रूपरेखा-प्रो, हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
10- भारतीय दर्शन सम्प्रदाय और समस्याएं - डा. सुरेन्द्र वर्मा
11- भारतीय दशरन आलोचन व अनुशील - डा. चन्द्रधर शर्मा
12- भारतीय नीतिशास्त्र - डा. दिवाकर पाठक
13- भगवद्गीता - महात्मा गाँधी
14- भगवदगीता - ए. जे. बाम
15- भारतीय दर्शन की रूपरेखा - एम. हिरियन्ना
16- भारतीय दर्शन में मोक्ष - डॉ. अशोक कुमार लाड
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Received on 27.05.2024 Modified on 11.06.2024 Accepted on 21.06.2024 © A&V Publication all right reserved Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2024; 12(2):125-130. DOI: 10.52711/2454-2687.2024.00021 |